हिन्दी भाषा नोट्स: हिन्दी वर्णमाला, विराम चिह्न

भाग–(1) भाषा

A. हिन्दी भाषा

हिन्दी वर्णमाला, विराम चिह्न

हिन्दी वर्णमाला

मार्गदर्शन खण्ड

हिन्दी भाषा की व्याकरणिक संरचना में ‘ध्वनि संरचना’ आरम्भिक बिन्दु है। ध्वनि के आधार पर ही अनन्त वाङ्मय (साहित्य) का निर्माण होता है। ध्वनि वागिन्द्रिय द्वारा व्यक्त वह रूप है, जो हमारी कर्णेन्द्रिय को स्पंदित करती है। यही ध्वनि जब दृश्य रूप में अंकित की जाती है, तो वह ‘वर्ण’ कहलाती है। वर्णों के व्यवस्थित समूह को ‘वर्णमाला’ कहते हैं।

‘वर्ण’ की मूल विशेषता है कि यह सरल, निरवयव एवं अविभाज्य अवयव होता है, जिसका और अधिक खण्ड नहीं हो सकता। उदाहरण के लिए ‘परिवार’ एक शब्द है, जिसका विभाजन निम्न वर्णों में होगा—

प + र् + इ + व् + आ + र् + अ

इस प्रकार ‘परिवार’ शब्द आठ वर्णों का समूह है, जिसमें 4 स्वर एवं 4 व्यंजन हैं।

अध्ययन सामग्री

हिन्दी वर्णमाला को मुख्यतः स्वर एवं व्यंजन के रूप में विभक्त किया गया है, जिसमें कुल 52 वर्ण हैं। इसमें 11 मूल स्वर व 33 मूल व्यंजन, 2 उत्क्षिप्त व्यंजन, 4 संयुक्ताक्षर व्यंजन और 2 अयोगवाह हैं।

क्रम वर्णों का प्रकार संख्या
1मूल स्वर11
2मूल व्यंजन33
3उत्क्षिप्त व्यंजन2
4संयुक्ताक्षर व्यंजन4
5अयोगवाह2

कुल = 52 वर्ण

स्वर संरचना

स्वर वे वर्ण हैं, जिनका उच्चारण बिना किसी अवरोध के होता है। स्वर वर्ग के भेद के अन्तर्गत निम्न प्रकार आते हैं।

1. मूल स्वर

अ, इ, उ, ऋ

2. दीर्घ स्वर

आ, ई, ऊ

3. संयुक्त स्वर

ए, ऐ, ओ, औ

ए, ऐ, ओ, औ मूल स्वरों के मेल से बने स्वर हैं।

स्वरों के उच्चारण-काल के आधार पर

प्रकार स्वर
लघु स्वर अ, इ, उ, ऋ
गुरु स्वर आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ

स्वरों का उच्चारण स्थान

स्वर उच्चारण स्थान संकेत
अ, आकण्ठ्यकण्ठ के प्रयोग से
इ, ईतालव्यतालु के प्रयोग से
मूर्धन्यमूर्धा के प्रयोग से
उ, ऊओष्ठ्यदोनों ओठों के स्पर्श से
ए, ऐकण्ठतालव्यकण्ठ और जीभ के स्पर्श से
ओ, औकण्ठोष्ठ्यकण्ठ द्वारा जीभ और ओठों के कुछ स्पर्श से

स्वरों का संक्षिप्त वर्गीकरण

आधार भेद उदाहरण
मात्रा/उच्चारण काल के आधार पर ह्रस्व अ, इ, उ, ऋ
दीर्घ आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ
जिह्वा के भाग के आधार पर अग्र स्वर इ, ई, ए, ऐ
मध्य स्वर
पश्च स्वर आ, उ, ऊ, ओ, औ
वायु-मार्ग के आधार पर निरनुनासिक/मौखिक स्वर अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ
अनुनासिक स्वर अँ, आँ, इँ, ईँ, उँ, ऊँ, एँ, ऐँ, ओँ, औँ
ओष्ठों की स्थिति के आधार पर वृत्तमुखी उ, ऊ, ओ, औ
अवृत्तमुखी अ, आ, इ, ई, ए, ऐ
मुख-विवर के आधार पर संवृत स्वर इ, ई, उ, ऊ
अर्ध संवृत स्वर ए, ओ
विवृत स्वर अ, आ, ऐ, औ

ध्येय / ध्यातव्य

संस्कृत व्याकरण में उच्चारण-काल के आधार पर स्वरों को ह्रस्व स्वर, दीर्घ स्वर एवं प्लुत स्वर में विभक्त किया जाता है। ह्रस्व स्वर के उच्चारण में सबसे कम समय लगता है, दीर्घ स्वर के उच्चारण में ह्रस्व स्वर से दोगुना समय तथा प्लुत स्वर के उच्चारण में ह्रस्व स्वर के उच्चारण की अपेक्षा तीन गुना समय लगता है। इसे तीन (3) का अंक लगाकर दर्शाया जाता है, जैसे— ओ३म्

नोट : हिन्दी में प्लुत स्वर का प्रयोग नहीं होता है।

व्यंजन संरचना

व्यंजन वे ध्वनियाँ हैं, जिनका उच्चारण स्वरों की सहायता के बिना नहीं हो सकता है। व्यंजनों को सामान्यतः वर्गीय या स्पर्श व्यंजन, अन्तःस्थ, ऊष्म एवं संयुक्त व्यंजन के रूप में विभक्त किया जाता है।

वर्गीय या स्पर्श व्यंजन

स्पर्श व्यंजन वे व्यंजन हैं, जिनका उच्चारण कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त एवं ओष्ठ आदि स्थानों के स्पर्श से होता है। क-वर्ग, च-वर्ग आदि में विभक्त करने के कारण इन्हें वर्गीय व्यंजन भी कहते हैं।

वर्ग व्यंजन उच्चारण स्थान
क-वर्गक, ख, ग, घ, ङकण्ठ्य
च-वर्गच, छ, ज, झ, ञतालव्य
ट-वर्गट, ठ, ड, ढ, णमूर्धन्य
त-वर्गत, थ, द, ध, नदन्त्य
प-वर्गप, फ, ब, भ, मओष्ठ्य

अन्तःस्थ व्यंजन

अन्तःस्थ व्यंजन चार हैं— य, र, ल, व। इन्हें ‘अन्तःस्थ’ इसलिए कहते हैं, क्योंकि इनका उच्चारण पारम्परिक स्वरों एवं व्यंजनों के बीच होता है। अन्तःस्थ व्यंजनों में य तथा व को ‘अर्द्ध स्वर’ भी कहते हैं।

व्यंजनउच्चारण स्थान
तालव्य
मूर्धन्य
दन्त्य
दन्तोष्ठ्य

ऊष्म व्यंजन

ऊष्म व्यंजन वे हैं, जिनका उच्चारण मुखांगों के घर्षण से उत्पन्न ऊष्मा से होता है। ये चार हैं— श, ष, स, ह

व्यंजनउच्चारण स्थान
तालव्य
मूर्धन्य
दन्त्य
कण्ठ्य

संयुक्त व्यंजन

हिन्दी में चार संयुक्त व्यंजन हैं, जिनका निर्माण दो व्यंजनों के योग से हुआ है—

संयुक्त व्यंजननिर्माण
क्षक् + ष
त्रत् + र
ज्ञज् + ञ
श्रश् + र

उत्क्षिप्त व्यंजन

उत्क्षिप्त व्यंजन दो हैं— ड़ एवं ढ़। इन व्यंजनों का विकास अपभ्रंश में हुआ, जहाँ से यह हिन्दी में ग्रहण किया गया। इनके उच्चारण में जीभ ऊपर उठकर मूर्धा को स्पर्श करती हुई त्वरित गति से नीचे गिरती है। इसी कारण इन्हें उत्क्षिप्त कहा जाता है।

व्यंजनों का उच्चारण

व्यंजनों के उच्चारण स्थान में भी विविधता है। वर्गीय/स्पर्श व्यंजनों के उच्चारण स्थान स्पष्ट हैं। क वर्ग कण्ठ द्वारा, च वर्ग तालु द्वारा, ट वर्ग मूर्धा द्वारा, त वर्ग दन्त द्वारा एवं प वर्ग ओष्ठ द्वारा उच्चारित होता है।

व्यंजन का संक्षिप्त वर्गीकरण

वर्ग संख्या व्यंजन
वर्गीय/स्पर्श 25 क से प वर्ग तक
अन्तःस्थ 4 य, र, ल, व
ऊष्म 4 श, ष, स, ह
उत्क्षिप्त 2 ड़, ढ़
संयुक्ताक्षर 4 क्ष, त्र, ज्ञ, श्र
अयोगवाह 2 अनुस्वार, विसर्ग

अल्पप्राण एवं महाप्राण व्यंजन

‘प्राण’ अर्थात् वायु की प्रयुक्ति के आधार पर व्यंजनों को अल्पप्राण एवं महाप्राण व्यंजनों के रूप में बाँटा गया है। प्रत्येक वर्ग का प्रथम, तृतीय एवं पंचम वर्ण अल्पप्राण एवं द्वितीय तथा चतुर्थ वर्ण महाप्राण होता है।

इसके अतिरिक्त अन्तःस्थ व्यंजन (य, र, ल, व) अल्पप्राण माने जाते हैं तथा ऊष्म व्यंजन (श, ष, स, ह) महाप्राण माने जाते हैं। ध्यान रहे कि सभी स्वर अल्पप्राण माने जाते हैं।

अल्पप्राण महाप्राण
क, ग, ङ, च, ज, ञ
ट, ड, ण, त, द, न, प, ब, म
य, र, ल, व
ख, घ, छ, झ, ठ, ढ, थ, ध, फ, भ
श, ष, स, ह

अघोष एवं सघोष वर्ण

जिन व्यंजनों के उच्चारण में स्वर-तंत्रियों में कंपन नहीं होता है, उन्हें ‘अघोष व्यंजन’ कहते हैं। वर्गीय या स्पर्श व्यंजनों में प्रथम एवं द्वितीय व्यंजन अघोष वर्ण एवं तृतीय, चतुर्थ तथा पंचमाक्षर सघोष वर्ण होते हैं। इसके अतिरिक्त श, ष एवं स को अघोष वर्ण एवं सभी स्वर, अन्तःस्थ (य, र, ल, व) एवं ह को सघोष वर्ण माना जाता है।

अघोष वर्ण सघोष वर्ण
क, च, ट, त, प
ख, छ, ठ, थ, फ
श, ष, स
ग, ज, ड, द, ब
घ, झ, ढ, ध, भ
सभी स्वर
सभी पंचमाक्षर
य, र, ल, व, ह

हल् चिह्न

जब हम ‘क’ वर्ण का उच्चारण करते हैं, या लिखते हैं तो यह सिर्फ व्यंजन नहीं है बल्कि इसमें ‘अ’ स्वर छिपा हुआ है।

क् + अ = क

व्यंजनों के नीचे लिखी तिरछी रेखा (्) को हल् चिह्न कहते हैं। किसी व्यंजन के नीचे इसे लगाने का तात्पर्य है कि उसमें स्वर का अभाव है। हल् चिह्न के प्रयोग से वह व्यंजन आधा माना जाता है।

जैसे— क्, ख्, ग् आदि विशुद्ध व्यंजन वर्ण हैं, जिसमें स्वर का बिल्कुल अभाव है।

अयोगवाह ध्वनियाँ

हिन्दी में अनुस्वार (ं) एवं विसर्ग (ः) को ‘अयोगवाह ध्वनि’ माना जाता है। ये न स्वर हैं एवं न व्यंजन, क्योंकि ये न तो स्वर की भाँति स्वतंत्र हैं एवं व्यंजन इसलिए नहीं हैं, क्योंकि ये स्वरों के पश्चात् आते हैं, पूर्व नहीं। अतः स्वर एवं व्यंजनों से अयुक्त होते हुए भी अर्थ के वहन (वाह) के लिए अनिवार्य होने के कारण इन्हें ‘अयोगवाह’ कहा जाता है।

अयोगवाह ध्वनि चिह्न
अनुस्वार
विसर्ग

अनुस्वार एवं अनुनासिक (पंचमाक्षर)

अनुस्वार एवं अनुनासिक दो नासिक्य ध्वनियाँ हैं, जिसमें अनुस्वार न तो व्यंजन है और न ही स्वर, जबकि अनुनासिक या पंचमाक्षर (ङ, ञ, ण, न, म) एक व्यंजन है। अनुस्वार को बिंदु (ं) एवं अनुनासिक को चंद्र बिंदु (ँ) से प्रदर्शित करते हैं।

अनुस्वार का तात्पर्य है— स्वर के बाद उच्चारण अर्थात् अनुस्वार का उच्चारण स्वर के पश्चात् होता है, जैसे— गंगा, मंदी, अंश आदि। अनुनासिक में नासिक्य ध्वनि स्वर के साथ जोड़कर बोली जाती है, जैसे— बाँस, आँचल, जोंक, चाँद आदि।

कुल मिलाकर अनुस्वार में नासिक्य ध्वनि स्वर के बाद उच्चारित होती है, जबकि अनुनासिक में नासिक्य ध्वनि स्वर के साथ जोड़कर बोली जाती है।

वर्तमान में अनुनासिक (पंचमाक्षर) एवं अनुस्वार सभी स्थानों पर अनुस्वार ही अधिक प्रचलित है। परन्तु शुद्धतावादियों के द्वारा अनुस्वार एवं अनुनासिक अलग-अलग प्रयुक्त होते हैं।

विराम चिह्न

अध्ययन सामग्री

त्रुटि रहित वाक्यों की रचना के लिए विराम चिह्नों को जानना अति आवश्यक है। प्रमुख विराम चिह्न निम्नलिखित हैं—

क्रम विराम चिह्न का नाम संकेत चिह्न
1पूर्ण विराम (Full Stop)
2अर्द्ध-विराम (Semi-Colon);
3अल्प-विराम (Comma),
4उप-विराम (Colon):
5प्रश्नवाचक चिह्न (Sign of Interrogation)?
6योजक चिह्न (Hyphen)-
7उद्धरण चिह्न (Inverted Commas)‘ ’ या “ ”
8रेखिका या निर्देशक-चिह्न (Dash)
9विवरण चिह्न (Colon + Dash):-
10हंसपद/त्रुटिपूरक चिह्न (Sign of Loftword)^
11संक्षेप सूचक चिह्न (Abbreviation)
12लोप-निर्देश......
13कोष्ठक (Bracket)[ ] { } ( )
14विस्मयसूचक या सम्बोधक (Sign of Exclamation)!

व्यंजन-संरचना

श्रेणी संख्या वर्ण
क वर्ग 5 क, ख, ग, घ, ङ
च वर्ग 5 च, छ, ज, झ, ञ
ट वर्ग 5 ट, ठ, ड, ढ, ण
त वर्ग 5 त, थ, द, ध, न
प वर्ग 5 प, फ, ब, भ, म
अन्तःस्थ 4 य, र, ल, व
ऊष्म 4 श, ष, स, ह
संयुक्त 4 क्ष, त्र, ज्ञ, श्र
उत्क्षिप्त 2 ड़, ढ़
अयोगवाह 2 अनुस्वार, विसर्ग

शब्द रचना, वाक्य रचना, अर्थ

शब्द रचना

‘शब्द’ से तात्पर्य अक्षर अथवा अक्षरों से निर्मित सार्थक एवं स्वतंत्र ध्वनि अथवा ध्वनि-समूह से है। शब्द एक अथवा अनेक अक्षरों के योग से बनते हैं। शब्दों अथवा वर्णों के योग से नए शब्द बनाने की प्रक्रिया शब्द रचना कहलाती है।

निरर्थक अक्षरों को मिलाकर सार्थक शब्द बनाती है। सन्धि में प्रायः शब्द का रूप छोटा हो जाता है। उदाहरण—

विद्या + आलय = विद्यालय

समास

समास— कम-से-कम शब्दों में अधिक से अधिक अर्थ प्रकट करने की प्रक्रिया है।


परीक्षा के लिए याद रखने योग्य Trick & Tips

  • हिन्दी वर्णमाला = 52 — 11 स्वर + 33 मूल व्यंजन + 2 उत्क्षिप्त + 4 संयुक्ताक्षर + 2 अयोगवाह।
  • अन्तःस्थ = य, र, ल, व
  • ऊष्म = श, ष, स, ह
  • उत्क्षिप्त = ड़, ढ़
  • संयुक्त = क्ष, त्र, ज्ञ, श्र
  • अयोगवाह = अनुस्वार (ं), विसर्ग (ः)
  • क-वर्ग कण्ठ, च-वर्ग तालु, ट-वर्ग मूर्धा, त-वर्ग दन्त, प-वर्ग ओष्ठ — इसे क्रम से याद रखें।
  • य-तालव्य, र-मूर्धन्य, ल-दन्त्य, व-दन्तोष्ठ्य
  • श-तालव्य, ष-मूर्धन्य, स-दन्त्य, ह-कण्ठ्य
  • हर वर्ग का 1st, 3rd और 5th = अल्पप्राण तथा 2nd और 4th = महाप्राण
  • सभी स्वर अल्पप्राण माने जाते हैं।
  • य, र, ल, व = अल्पप्राण तथा श, ष, स, ह = महाप्राण
  • वर्ग के पहले और दूसरे वर्ण अघोष, जबकि तीसरे, चौथे और पाँचवें वर्ण सघोष होते हैं।
  • प्लुत स्वर संस्कृत व्याकरण में 3 मात्रा के होते हैं, लेकिन हिन्दी में प्लुत स्वर का प्रयोग नहीं होता।
Previous Post Next Post