संस्कृत भाषा : भाषा अधिगम प्रक्रिया एवम् वर्ण विचार

B. संस्कृत भाषा

भाषा अधिगम प्रक्रिया

अध्ययन सामग्री

भाषा क्या है?

मनुष्य के विभिन्न वाक् अवयवों और मानसिक क्रियाओं के कारण विभिन्न प्रकार की ध्वनियों को उत्पन्न करने में समर्थ होता है और अपने विचारों को व्यक्त करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है। यही भाषा है। भाषा पारस्परिक विचारों के आदान-प्रदान का एक साधन है। भाषा को समस्त मानसिक शक्तियों, भावों तथा विचारों के आदान-प्रदान का आधार माना जाता है। भाषा से ही समाज का गठन एवं संस्कृति का विकास होता है।

भाषा अर्जन एवं सम्बन्धित तथ्य

भाषा अर्जन की प्रक्रिया स्वाभाविक, सहज और अनौपचारिक प्रक्रिया है जो कक्षा में भाषा के अधिगम से भिन्न है। इसका आशय यह है कि शिशु अपने परिवेश में श्रवण और अनुकरण की प्रक्रिया द्वारा स्वयं भाषायी संकेतों एवं अपने परिवेश में बोली जाने वाली भाषा की ध्वनियों को सुनकर ग्रहण करता है और उन्हें व्यक्त करने के कौशल का विकास करता है।

स्वतः भाषा अर्जन की प्रक्रिया दो वर्ष की अवस्था तक चलती रहती है जो मुख्यतः श्रवण और अनुकरण की प्रकृति प्रदत्त शक्ति पर निर्भर है।

प्रमुख भाषा अर्जन युक्तियाँ

  • सहजता
  • अनुकरण
  • अभिव्यक्ति की व्यग्रता
  • अभ्यास
  • बारंबारता एवं संक्षिप्तता

(i) सहजता

भाषा का प्रयोग विशिष्ट परिस्थितियों एवं संदर्भों में होता है। बालक इन संदर्भों में भाषा प्रयोगों को सुनता है और ग्रहण करता है।

(ii) अनुकरण

भाषा अर्जन में सामान्यतः अनुकरण की प्रवृत्ति दिखाई देती है। अनुकरण की तीन प्रमुख अवस्थाएँ हैं—

  1. बालक जब नये व्याकरणिक रूप सुनता है, तो वह उनका अनायास अनुकरण करता है।
  2. इन नये रूपों को सहज अभ्यास द्वारा अपने व्यवहार में शामिल कर लेता है।
  3. वह सरल रूपों को पहले और जटिल रूपों को बाद में ग्रहण करता है।

(iii) अभिव्यक्ति की व्यग्रता

नवीन भाषायी प्रयोगों को सीखते समय बालक सीखे हुए प्रयोगों को लगातार दोहराते रहते हैं। वस्तुतः इसके मूल में अपने-आपको सहज अभिव्यक्त करने की व्यग्रता होती है।

(iv) अभ्यास

भाषा-भाषा में अभ्यास की महत्वपूर्ण भूमिका है। परिवार में माता-पिता तथा अन्य सदस्यों के बीच शिशु भाषायी प्रयोगों को सहज रूप में दोहराता रहता है।

(v) बारंबारता एवं संक्षिप्तता

भाषा अर्जन में भाषायी प्रयोगों की बारंबारता बालक के भाषायी विकास में सहायक है। बालक जिन रूपों को बार-बार सुनता है उन्हें वह जल्दी सीख लेता है।

बालक के विकास में भाषा की भूमिका

शारीरिक और मानसिक दृष्टि से स्वस्थ शिशु जन्म के लगभग छह माह से ही धीरे-धीरे अपनी मातृभाषा का अनुकरण करने लगता है। दो से ढाई वर्ष की आयु का शिशु अपने माँ-बाप, अपने घर-परिवार तथा आस-पड़ोस के बाल मित्रों के संपर्क में आते हुए उन्हीं से अपनी आत्माभाषा का अर्जन करता है।

बालक के विकास के महत्वपूर्ण पक्ष

क्रम पक्ष
1मानसिक विकास
2संवेगात्मक विकास
3नैतिक विकास
4सामाजिक विकास

(i) मानसिक विकास

मानसिक विकास-चयन के आरम्भिक दिनों में विचार-विनिमय का आधार मातृभाषा ही है। बालक की समस्त मानसिक शक्तियों (कल्पना, ध्यान, स्मृति, चिंतन, मनन इत्यादि) के विकास का माध्यम मातृभाषा ही है।

(ii) संवेगात्मक विकास

भाषा बालक के संवेगों की अभिव्यक्ति का माध्यम है। हर्ष, क्रोध, भय, घृणा, चिंता आदि भावों की अभिव्यक्ति कुछ अन्य संकेतों से भी संभव है, पर सभी भावों की स्पष्ट अभिव्यक्ति द्वारा संभव नहीं है, उनके लिए हमें भाषा की ही सहायता लेनी पड़ती है।

(iii) नैतिक विकास

बालक के साथ संपर्क में आने वाले छोटे तथा बड़ों के प्रति स्नेह एवं आदर प्रकट करना सिखाया जाता है। सत्य बोलने या उन्हें आचरण का शिक्षा भी आरंभ से परिवार के लोगों से ही होती है।

(iv) सामाजिक विकास

बालक अपने परिवार तथा पड़ोस के अन्य बच्चों के साथ लड़ता, झगड़ता, खेलता रहता है। इन सभी क्रियाकलापों के माध्यम से भाषा ही होती है। भाषा के माध्यम से सामाजिक गुणों तथा व्यवहार की कुशलता का विकास होता है।

शिशु के भाषा विकास के चरण

सामान्यतः शिशु भाषा विकास के निम्न चरणों से गुजरता है—

चरण समय
प्रथम प्रथम 8–9 महीने तक – कूदना, किलकना, बबलाना आदि की क्रिया
प्रथम शब्द लगभग 9–12 महीने से
द्विशब्दीय वाक्य 1.5 से 2 वर्ष
तीन शब्दीय वाक्य 2.5 से 3 वर्ष
सरल छोटे वाक्य 4 वर्ष

शिशु द्वारा प्रयुक्त वाक्यों के प्रकार

शिशु अपने भाषा विकास के क्रम में चार प्रकार के वाक्यों का प्रयोग करता है—

  1. निर्देशक वाक्य
  2. निषेधात्मक वाक्य
  3. प्रश्नवाचक वाक्य
  4. आज्ञार्थक वाक्य

(i) निर्देशक वाक्य

बालक द्वारा प्रयुक्त वाक्यों में निर्देशक या सकारात्मक वाक्यों की संख्या अधिक होती है, क्योंकि प्रारम्भिक वाक्य-विकासावस्था में शिशु अपनी भावाभिव्यक्ति के लिए इस तरह के वाक्य बोलता है। दो वर्ष के बाद सर्वनामों का प्रयोग भी सीखता है।

(ii) निषेधात्मक वाक्य

बालक में नकारात्मक वाक्यों का विकास बहुत शीघ्रता से होता है। प्रारम्भ में वह मुँह फेर कर नकारात्मक वक्त करता है, पर बाद में ‘नहीं’, ‘मत’ और ‘न’ का यथास्थान प्रयोग भी सीखता है।

(iii) प्रश्नवाचक वाक्य

प्रारम्भ में शिशु में प्रश्नवाचक भाव इशारे से अथवा चेहरे से प्रकट होता है। पहले वह किसी प्रश्नवाचक शब्द का प्रयोग किए बिना मात्र अनुमान के सहारे ही प्रश्न बनाता है, पर बाद में प्रश्नों के विकास में एक क्रम दिखाई देने लगता है। शिशु पहले ‘कहाँ’ वाले प्रश्न बनाता है, इसके बाद ‘क्या’ और ‘कौन’ वाले प्रश्न, फिर ‘क्यों’ वाले प्रश्न विकसित होते हैं।

(iv) आज्ञार्थक वाक्य

आज्ञार्थक वाक्य का विकास बहुत प्रारम्भिक अवस्था में ही हो जाता है। आज्ञार्थक भाव की अभिव्यक्ति ‘दो’, ‘आ’ जैसे एक शब्दीय वाक्यों में भी मिलती है। अनुरोध, आग्रह वाले वाक्य भी बाद में प्रयुक्त करता है।

वाक्य संरचना स्तर

इस स्तर को हम प्रारम्भिक वाक्य-विन्यास स्तर और उत्तर-वाक्य-विन्यास स्तर में विभक्त कर सकते हैं। प्रारम्भिक स्तर पर बालक द्वारा निर्मित एक शब्दीय वाक्य होते हैं। बाद में द्विशब्दीय वाक्य आदि का विकास होता है।

वर्ण विचार

भाषा की सबसे छोटी इकाई को वर्ण कहते हैं। पाणिनि ने वर्णमाला को 14 सूत्रों में प्रस्तुत किया है। परम्परा के अनुसार महेश्वर ने अपने नृत्य की समाप्ति पर जो 14 ढोल बजाए, उससे ये 14 सूत्र (सूत्रों) रूप में प्राप्त हुए।

महेश्वर सूत्र

अइउण्, ऋलृक्, एओङ्, ऐऔच्, हयवरट्, लण्,
ञमङणनम्, झभञ्, घढधष्, जबगडदश्,
खफछठथचटतव्, कपय्, शषसर्, हल्

महेश्वर सूत्र के अन्त में हल वर्ण का प्रयोग प्रत्याहार बनाने के उद्देश्य से किया गया है। जैसे— अइउण् में ‘ण’ इत् वर्ण है। इन्हें प्रत्याहारों के अन्तर्गत आने वाले वर्णों के साथ सम्मिलित नहीं किया जाता है।

प्रत्याहार

प्रत्याहार— महेश्वर सूत्रों के आधार पर वर्णों के समूह का निर्माण किया जा सकता है। प्रत्याहार दो वर्णों से बनता है। जैसे— अच्, हल् आदि।

वर्ण दो प्रकार के होते हैं

  1. स्वर
  2. व्यंजन

स्वर

संस्कृत व्याकरण में स्वरों की संख्या 9 मानी गई है— ह्रस्व, दीर्घ तथा प्लुत।

प्रकार अर्थ
ह्रस्व स्वर जिन स्वरों के उच्चारण में एक मात्रा का समय लगे।
दीर्घ स्वर जिन स्वरों के उच्चारण में दो मात्राओं का समय लगे।
प्लुत स्वर जिनके उच्चारण में तीन मात्राओं का समय लगे।

ह्रस्व स्वर के उदाहरण— अ, इ, उ, ऋ, लृ। इन्हें मूल स्वर भी कहते हैं।

दीर्घ स्वर— आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ। ए, ऐ, ओ और औ दीर्घ स्वर दो स्वरों के मेल से बने हैं।

प्लुत स्वर के प्रयोग में विशेष प्रकार की ध्वनि को बुलाने एवं पुकारने में प्रयुक्त होता है। जैसे— हे देवदत्त!

अनुनासिक

जिस स्वर के उच्चारण में मुख और नासिका दोनों की सहायता ली जाती है उसे अनुनासिक स्वर कहते हैं। ऐसे स्वरों को दिखाने के लिए उनके ऊपर चन्द्र बिन्दु (ँ) लगाया जाता है।

व्यंजन (हल)

व्यंजन वर्ण उच्चारण के लिए स्वर की सहायता लेते हैं। संस्कृत व्याकरण में ‘हल’ कहा जाता है। स्वर रहित व्यंजन को लिखने के लिए वर्ण के नीचे हल् चिह्न (्) लगाते हैं।

वर्ग व्यंजन
क-वर्गक, ख, ग, घ, ङ
च-वर्गच, छ, ज, झ, ञ
ट-वर्गट, ठ, ड, ढ, ण
त-वर्गत, थ, द, ध, न
प-वर्गप, फ, ब, भ, म
अन्तःस्थय, र, ल, व
ऊष्मश, ष, स, ह

स्पर्श

‘क’ से ‘म’ तक के 25 वर्णों को स्पर्श कहते हैं। इनके उच्चारण के समय जिह्वा मुख के विभिन्न स्थानों का स्पर्श करती है। प्रत्येक वर्ग के अन्तिम वर्ण— ङ, ञ, ण, न और म को अनुनासिक भी कहा जाता है।

अन्तःस्थ

य, र, ल और व वर्णों को अन्तःस्थ कहते हैं। इन्हें अर्द्ध स्वर भी कहा जाता है।

ऊष्म

इन वर्णों के उच्चारण में गर्म वायु मुख से बाहर निकलती है। ये चार हैं— श, ष, स तथा ह।

अयोगवाह

अयोगवाह वे अक्षर हैं जो वर्ण अकेले नहीं रहते, अपितु स्वरों या उनकी मात्राओं के बाद लगकर भाषा में प्रयुक्त होते हैं। चार प्रमुख अयोगवाह बताए गए हैं— यम, अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय के प्रयोग से अयोगवाह के रूप में आते हैं।

वर्णों के उच्चारण स्थान

स्थान स्वर व्यंजन अन्तःस्थ
कण्ठ अ, आ क, ख, ग, घ, ङ, ह —
तालु इ, ई च, छ, ज, झ, ञ य
मूर्धा ऋ, ॠ ट, ठ, ड, ढ, ण र
दन्त ऌ त, थ, द, ध, न ल
ओष्ठ उ, ऊ प, फ, ब, भ, म —
कण्ठोष्ठ ओ, औ — —
दन्तोष्ठ — — व

याद रखने की Trick

कण्ठ → तालु → मूर्धा → दन्त → ओष्ठ
क-वर्ग → च-वर्ग → ट-वर्ग → त-वर्ग → प-वर्ग

आभ्यन्तर एवं बाह्य प्रयत्न

वर्णों के उच्चारण काल में मुख के अन्दर मनुष्य की चेष्टापरक क्रिया को आभ्यन्तर प्रयत्न कहते हैं। इसके पाँच भेद हैं—

  1. स्पृष्ट
  2. ईषत्स्पृष्ट
  3. ईषद्विवृत
  4. विवृत
  5. संवृत

वर्णों के उच्चारण काल में मुख के बाहर होने वाली चेष्टा को बाह्य प्रयत्न कहते हैं। इसके ग्यारह भेद हैं— विवार, संवार, श्वास, नाद, घोष, अघोष, अल्पप्राण, महाप्राण, उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित।

विवर–संवार

वर्णों के उच्चारण में मुख के खुलने एवं बंद होने की स्थिति को विवर-संवार कहा जाता है।

श्वास–नाद

वर्णों के उच्चारण में श्वास चलता है, उनका बाह्य प्रयत्न श्वास होता है। जिनके उच्चारण में एक प्रकार की गूँज होती है, उनका प्रयत्न नाद होता है।

घोष–अघोष

जिनके उच्चारण में गूँज नहीं होती, उनका प्रयत्न अघोष होता है। जिनके उच्चारण में गूँज होती है, उनका प्रयत्न घोष होता है।

अल्पप्राण–महाप्राण

जिनके उच्चारण में प्राणवायु का अल्प उपयोग होता है, उनका बाह्य प्रयत्न अल्पप्राण कहलाता है। जिनके उच्चारण में प्राणवायु का अधिक उपयोग होता है, उनका बाह्य प्रयत्न महाप्राण कहलाता है।

व्याकरण शास्त्र की प्रमुख संज्ञाएँ एवं परिभाषाएँ

1. वृद्धि संज्ञा

सूत्र— वृद्धिरादैच्
विच्छेद— वृद्धि = आत्, ऐच्
अर्थात्— आ, ऐ और औ इन तीन वर्णों की वृद्धि संज्ञा होती है।

2. गुण संज्ञा

सूत्र— अदेङ् गुणः
विच्छेद— अ, एङ्, गुणः
अर्थात्— अ, ए और ओ इन तीन वर्णों की गुण संज्ञा होती है।

3. संयोग संज्ञा

सूत्र— हलोनन्तराः संयोगः
विच्छेद— हल् + अनन्तर = संयोग।

4. अनुनासिक संज्ञा

सूत्र— मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः
विच्छेद— मुख-नासिका-वचनो = अनुनासिक।

5. सवर्ण संज्ञा

सूत्र— तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम्
विच्छेद— तुल्य-आस्य-प्रयत्न = सवर्ण।

6. निष्ठा संज्ञा

सूत्र— क्तक्तवतू निष्ठा
विच्छेद— क्त, क्तवतू = निष्ठा।

7. सर्वनाम संज्ञा

सूत्र— सर्वादीनि सर्वनामानि
विच्छेद— सर्व-आदीनि सर्वनामानि।

8. ति संज्ञा

सूत्र— स्त्रीचौ तिपौ
विच्छेद— अच् अन्त्य आदि ति।

9. उपधा संज्ञा

सूत्र— अलोऽन्त्यात् पूर्व उपधा
विच्छेद— अल्-अन्त्यात् पूर्व उपधा।

10. उपसर्ग संज्ञा

सूत्र— उपसर्गाः क्रियायोगे

11. धातु संज्ञा

सूत्र— भ्वादयो धातवः

लिंग भेद

लिंग का अर्थ है— वह विशेष अर्थ जिसके द्वारा यह पता चले कि अमुक संज्ञा शब्द स्त्री जाति के लिए और अमुक पुरुष जाति के लिए प्रयुक्त किया गया है, उसे लिंग कहते हैं।

हिन्दी में दो लिंग होते हैं, किन्तु संस्कृत में तीन लिंग होते हैं—

  • पुल्लिंग
  • स्त्रीलिंग
  • नपुंसकलिंग

सभी संज्ञाएँ इन्हीं तीन लिंगों में विभक्त हैं। कोई पुल्लिंग, कोई स्त्रीलिंग और कोई नपुंसकलिंग। एक ही वस्तु का बोध कराने वाले कई शब्द पुल्लिंग में हो सकते हैं।

पुल्लिंग शब्द

पाक, त्याग, कर, गर, सञ्ज्वर, गोचर, लोक, मास, गोत्र, संख्या, सोमप, धूमप, जलीय, गिरि, रवि, वर्षि आदि शब्द पुल्लिंग हैं।

उदाहरण— देव, असुर, आत्मा, स्वर्ग, गिरि, समुद्र, नख, केश, रत्न, पुत्र, वस्त्र, फल आदि।

नोट— हिन्दी में पुल्लिंग में प्रयुक्त होने वाले कुछ शब्द संस्कृत में स्त्रीलिंग होते हैं, अतः संस्कृत में उनका ध्यान रखना चाहिए।

स्त्रीलिंग शब्द

कला, निशा, मति, बुद्धि, गति, भक्ति, शक्ति, श्रुति, स्मृति, शान्ति, कीर्ति, रीति, जाति, राशि, नारी, नदी, गीता, पृथ्वी आदि स्त्रीलिंग शब्द हैं।

उदाहरण— भूमि, विद्या, गंगा, लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, कृति आदि।

नोट— हिन्दी में महिला/स्त्री आदि के लिए प्रयुक्त कुछ शब्द संस्कृत में अलग लिंग में हो सकते हैं, अतः संस्कृत में विशेष ध्यान रखना चाहिए।

नपुंसकलिंग शब्द

मित्र, मुख, नक्षत्र, बीज, गुण, गगन, ज्ञान, दधि, नेत्र, सरोवर, जल, पत्र, फल, पुष्प, वन, वस्तु आदि नपुंसकलिंग शब्द हैं।

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण Trick & Tips

  • संस्कृत में 3 लिंग — पुल्लिंग, स्त्रीलिंग, नपुंसकलिंग।
  • हिन्दी में 2 लिंग — पुल्लिंग और स्त्रीलिंग।
  • वृद्धि = आ, ऐ, औ
  • गुण = अ, ए, ओ
  • अन्तःस्थ = य, र, ल, व
  • ऊष्म = श, ष, स, ह
  • स्पर्श = क से म तक 25 वर्ण
  • प्रत्याहार में अन्त का इत् वर्ण स्वयं समूह में शामिल नहीं होता।
  • ह्रस्व = 1 मात्रा, दीर्घ = 2 मात्रा, प्लुत = 3 मात्रा।
  • कण्ठ → तालु → मूर्धा → दन्त → ओष्ठ — पाँच वर्गों का क्रम।
  • क-वर्ग = कण्ठ, च-वर्ग = तालु, ट-वर्ग = मूर्धा, त-वर्ग = दन्त, प-वर्ग = ओष्ठ।
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